अंतर्द्वंद्व

 कुछ टूटा है आज, चुपके से मुझमें मैं कहीं

बिखरा हुआ सा है, जो जुड़ा था ही नहीं कभी,

अंधेरों में गुम था जो, उजालों का मोहताज था भी नही कभी

खैर अच्छा ही है , बिखरना उसका, खोना उसका , क्योंकि शायद वो बस एक एहसास था ,

एहसास जो जन्मा था रूढ़िवादी परंपराओं से , और जन्मा  था अंधविश्वास के संस्कार से,

उफना था अहंकार के अलगाव से, खड़ा था सामाजिक परिभाषाओं से

शायद समर्पण की जंजीर टूटी, और टूटा है आदर्श भी

धधकती हुई ज्वाला थी, आग थी इक पहचान की 

राख हो चुकी है, अब आशाएँ मेरी , परिभाषाएँ मेरी

धारणाएँ बदल रहीं हैं, भ्रातियाँ भी अब तितर बितर सी हैं

या यूँ कहूँ कि हैं ही नहीं, जो है ही नही उससे जुड़ना क्या

 उस पर रोना क्या ,हँसना क्या, लड़ना क्या, झगड़ना क्या

क्या बहकना और क्या संभलना ?

बुलंदियाँ बस एक एहसास हैं और एहसास ही तो है एक हार भी

कविताएँ भी और  दुनिया भर की भर्त्सनाएँ भी

कुछ अपना था ही नहीं, बस मुश्किल है थोड़ा पहचानना

या सब अपना  ही है, पर मुश्किल है सबको ही एक मानना ?


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