Posts

Showing posts with the label Creativity Corner

अव्दैत!

Image
  मै स्वप्नलोक के कतरों पर ,‌अब तक‌ जीवन को जीती थी, चोरी के सपनों से सींचा‌ हर दिन, सु:ख का बादल जाता था,  पर चोरी तो आख़िर चोरी है, हर सुख के कंकड़ के बदले,  सागर में जितना जल अथाह , उससे ज्यादा ही दु:ख आ‌ जाता था। इस चक्र का कोई अंत भला‌ भी, कहां‌ समझ ही आता‌‌ था, फिर कुछ धुंध हटी इन आंखों‌ की, जाना मैंने कुछ नश्वर को,  थोड़ी सी ही समझ है मेरी, पर मुझ क्षण-भंगुर जैसे को भी उसने जाने कैसे संभांल लिया। जलता बुझता इक दिया थी मैं, न जाने हर चिंगारी के मिट जाने पर भी,  कैसे उसने फिर आंच दिया, सु:ख की है परिभाषा झूठी, दु:ख भी झूठा ही जाना, झूठा मोह है, है झूठी माया  ये सब तो बस उसकी छोटी सी एक झांकी हैं,  मिटती है फिर बनती है, बन कर फिर से मिट जाती है, जो है कहानी हर जीवन की , बहुत 'अलग' तो किसकी ही हो जाती है? उस झाकीं को जो अपना जाने, खुद को जो भी 'मैं' माने,  खुद के लिए जो सु:ख ही चाहे, पर हर दु:ख से जो मुक्ति चाहे, वो ही तो है सु:ख का चोर, पाखंड रोज़ वो रचता है,  है बाह्य-सु:ख ही अंतिम सत्य , इस भ्रम में हर छण को जीता है, इस सत्य को अब पहचान...

Bliss from the rain

Image
  If you come in the rain ever, Bring me  All that freshness from the clouds,you have been soaking in, All that aroma from the petrichor , you have been drenching in, All that Nostalgia from your childhood days, close to the hearts ,you were just seeping in , And that Melody from the nature, the one on which are still tuning in! O my light! Bring me a piece from the nature to heal my heart  & Bring me peace from thou nature to wash my soul. That piece & the peace, which only this weather can offer, This gesture of the Earth, which only this rain can bring forth Bring me the love, the laughter, the ecstasy, the bliss,  the infinity and the none, make me whole and make me null, Take everything that's me and yet make me every inch of me!!

अकथित

Image
ये कविता लिंग भेद से पथक , समाज के उस वर्ग को सर्मपित है, जिसमें अभी अभी इस चेतना का नवीन संचार होना शुरू मात्र हुआ है कि जीवन का मूल केन्द्र उस व्यक्ति विशेष का ही होना चाहिये , फिर वो चाहे उसके उपरान्त किसी प्रकार की गुलामी ही क्युं न‌ स्विकार ले, क्यूंकि यह गुलामी भी एक स्वतंत्र गुलामी होगी, पर इस चेतना को सदैव जागृत रखना, सदैव इस बात की स्मृति रखना ,उसकी जिम्मेदारी ही है, जब तक भी वह जिवित है‍। पर क्युंकि बेहोशी चैतन्य की, जो अज्ञान से उठती है, इस अधूरे ज्ञान के क्षण में अखरती है ,जब तक वह इस बात को नहीं स्विकारता कि वह अभी भी स्वतंत्र‌ है और हर क्षण घटता हुआ उसके ही चुनावों का नतिजा है, ये उसी स्विकार्य के पहले की आह है, जहां वो समस्या को अन्यत्र कहीं देख रहा है अ भी। परवाह के साए में कत्ल ए आम करते रहो तुम, जिंदगी को मेरी , खमखा ही अपनी जिद की जद्दोजहद में सरेआम करते रहो तुम,  दोखज हो गया है, दोखज़ ही रह जाएगा जो,  जनाजा तो उठेगा नही, मालूम है हमें दरिया मे ही बह जायेगा जो बेबसी में बस एक चलता -फिरता , तुम्हारे फिक्र के कर्जो की गुलामी में दबता,  एक मुर्दा लाश ही रह...